Difference between revisions of "Ramcharitmanas"
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सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।। | सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।। | ||
Revision as of 16:15, 15 September 2021
चौपाई
बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सरस अनुरागा।
अमिय मूरिमय चूरन चारु। समन सकल भव रुज परिवारु ।।
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती।।
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी।।
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती।।
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू।।
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।।
सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।।
दोहा/सोरठा
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिध्द सुजान।
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान।।1।।